Thursday, February 24, 2011

मौन की झंकार

मेरे प्रिय प्रेम,
 
जब भी मैं तनहा होता हूँ
और तनहा होता हूँ
और तनहा होता हूँ
तो ऐसा लगता है
जैसे बहुत थोड़ा होता हूँ
कहना चाहता हूँ बहुत कुछ
महसूस करना चाहता हूँ
अपने होने का एहसास
ऐसे में सामने आता है
खिड़की से झांकते तारों की
झिलमिलाती रौशनी में
तुम्हारा दुधिया  अक्स
देखता हूँ चुपचाप
तुम्हें अपनी साँसों में उतरते हुए
कभी तुमने ही कहा था
कि जब भी कहना हो बहुत कुछ
तो मौन साध लेना
मैं सुन लूंगी तुम्हारे
मौन कि झंकार
चुपके से उतर आऊंगी
तुम्हारी साँसों में
हर बार कोशिश करता हूँ
तुम्हें रोकने की
कि अबकी तुम्हें सुननी ही होगी
वो सब कुछ
जो मैं कहना चाहता हूँ
लेकिन हर बार सहनी  पड़ती है
तुम्हें जाते हुए देखने की छटपटाहट
बेबस हूँ कि रोक नहीं सकता
तुम्हें रोक भी लूँ
लेकिन कैसे रोक सकता हूँ
उन साँसों को
जिन्हें रोक लेना भी
मौत का सबब है
और छोड़ देना भी
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